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गझल |
बंडखोरी |
क्रान्ति |
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गझल |
नवे ऋतू |
क्रान्ति |
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गझल |
मिसरे |
क्रान्ति |
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गझल |
पारखी |
क्रान्ति |
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गझल |
कर्ज |
क्रान्ति |
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गझल |
बंडाचा झेंडा कधीच नव्हता हाती! |
क्रान्ति |
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गझल |
आज का? |
क्रान्ति |
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गझल |
मनाला |
क्रान्ति |
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गझल |
कळा लागल्या |
क्रान्ति |
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गझल |
सोयरा |
क्रान्ति |
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गझल |
अलिप्त |
क्रान्ति |
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गझल |
ग झ ल : ७ (अ) : दुरूस्त आणी पुनः संपादित : मला तो का वियोगाची व्यथा देतो ? |
खलिश |
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गझल |
गझल - ६.(ब) : साकी मला तू असा, गळका जाम देऊ नको : दुरूस्त आणी पुनः संपादित |
खलिश |
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गझल |
ग झ ल : तू कधी स्वप्नात माझ्या येशील का ? ..... |
खलिश |
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गझल |
बहरली मनाची कधी बाग साधी ? |
खलिश |
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गझल |
चुंबने घेउनी जे तुला बोचले.... |
खलिश |
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गझल |
गझल : मी तुझ्या प्रेमात आहे, तू मला ही प्रेम कर...... |
खलिश |
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गझल |
मी फुलांची मूक भाषा जाणतो..... |
खलिश |
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गझल |
फुलानां स्वप्नात ही काटे बोचले ..... |
खलिश |
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गझल |
हवे मधे किती छान गारवा होता..... |
खलिश |
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गझल |
ह्या मनाचे, दुश्मनाचे काय करावे ?.... |
खलिश |
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गझल |
मला माझ्या गुन्ह्याची फार मोठी स ज़ा झाली .... |
खलिश |
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गझल |
साकी मला तू असा, गळका जाम देऊ नको |
खलिश |
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गझल |
ग झ ल : रात्र थोडी गार होती ..... |
खलिश |
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गझल |
फुलांना दंश काट्यांचे हवे होते..... |
खलिश |